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सच्चिदानंद झा के निधन से शोक में डूबा मिथिला, दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

झंझारपुर मधुबनी/डॉ. संजीव शमा : जिले के कोइलख निवासी पं0 काशीनाथ झा “विद्यालंकार” के घर सन 1928 के तीन फरवरी को जन्मे सच्चिदानन्द झा अप्रतिम प्रतिभाशाली के धनी व्यक्तित्व थे। माँ मैथिली के ऐसे सच्चे सपूत का हमारे बीच से अचानक चले जाना सहज विश्वास नहीं होता। ये बातें मैथिली साहित्य के सेवक हितनाथ झा ने उनके निधन पर शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा। उन्होंने श्री झा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से एम.ए.,बी.एल. करने के पश्चात मधुबनी सिविल कोर्ट में अधिवक्ता के रुप में 1954 तक प्रैक्टिस में रहे। बिहार न्यायिक सेवा में बतौर जज चयन के पश्चात 1955 से 1986 तक लगभग 31 वर्षों तक न्यायिक सेवा में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में देवघर,छपरा,पूर्णिया, राँची(इंडिस्ट्रियल ट्रिब्यूनल जज) के अलावा पटना विधान परिषद के सचिव पद पर भी रहे।

पटना हाईकोर्ट के राँची बेंच में अपर महानिबंधक के रूप में सेवा दिये। श्री झा को पटना में गठित CBI कोर्ट का प्रथम न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त हुआ। जिला न्यायालय देवघर के उदघाटन के बाद श्री झा को प्रथम प्रधान जिला जज के रूप में नियुक्ति की गई। जिला उपभोक्ता फोरम मधुबनी के प्रथम अध्यक्ष के साथ लोक अदालत मधुबनी का भी प्रथम अध्यक्ष के रूप में पदस्थापित होना श्री झा के लिये गर्व की बात रही ।उन्होंने अपने न्यायिक सफर में बतौर CBI जज अनेको महत्वपूर्ण फैसला सुनाये।जिसमें अय्यर कमीशन भी शामिल है। उनके निधन से संपूर्ण मैथिल समाज मर्माहत है। साहित्यकार डॉ.महेन्द्र नारायण राम ने कहा कि सचिदा बाबू न्यायिक सेवा में रहते हुए मिथिला मैथिली के लिये सतत चिंतनशील रहे ।

उन्होंने बताया कि सचिदा बाबू के पिता पं.काशीनाथ झा ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की जिसमें प्रस्थानय प्रकाशिका, दुर्गासप्तशती,आध्यात्मिक रहस्य,कायाकल्प,काशी महिमा प्रकाश,विंध्याचल माहात्म्य,गया श्राद्ध पद्धति आदि रचना प्रमुख है।साहित्यकार पिता के पुत्र होने के कारण सचिदा बाबू में साहित्य के प्रति असीम प्रेम होना स्वाभाविक है।

जज साहब साहित्यिक, सांस्कृतिक,सामाजिक कार्य के साथ मधुबनी पेंटिंग आदि में गहरी रुचि रखते थे। जज साहब का मधुबनी आवास साहित्यिक केन्द्र बिन्दु के रूप में प्रसिद्ध था ।जहाँ मैथिली साहित्यकार, कलाकारों का आना-जाना रहता था। उन्होंने मधुबनी पेंटिंग के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये। उन्होंने विमल कीर्ति मधुबनी नाम से एक संस्था की स्थापना की ।जहां पद्मश्री सीता देवी, महासुन्दरी देवी,शान्ति देवी, पद्मश्री गोदावरी दत्त, कृष्णानन्द झा, डॉ.शंकर कुमार झा आदि की सहभागिता रहती थी।मधुबनी में महिला सशक्तिकरण के लिए उनके गंभीर प्रयास को कभी भुलाया नहीं जा सकता।मिथिला आर्ट के धरोहरों के संरक्षण के लिए उन्होंने मधुबनी आर्ट म्यूजियम की स्थापना कर कला के क्षेत्र में एक अमूल्य योगदान दिया।साहित्यकार कवि डॉ.अनिल ठाकुर ने कहा कि सचिदा बाबू का जीवन काफी संयमित था। वे त्वरित न्याय,’दोषी छूटय नहि,निर्दोष फँसय नहि’ पर विश्वास करते थे। ये उनके जीवन का मूलमंत्र भी था। जिसे जीवन के अंत तक सफलता पूर्वक निर्वाह करते रहे। साहित्यकार कवि डॉ.संजीव शमा ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि पिताजी बताते थे कि जज साहब साहित्य के बड़े प्रेमी थे।

पटना स्थित छज्जूबाग सरकारी आवास पर जज साहब युवाओं के साहित्यिक उत्थान के लिए “युवालेखन” गोष्ठी का आयोजन किया करते थे। उन्होंने चर्चा करते हुए बताया कि सन 1973 में जज साहब के आवास पर डॉ.भीमनाथ झा के संयोजकत्व में विशाल कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ था। जिसमें करीब चालीस कवियों ने भाग लिया था। सचिदा बाबू को चार यशस्वी पुत्र एवं एकमात्र पुत्री श्रीमती ज्योतिर्मयी झा एवं दामाद सेवानिवृत्त भा.प्र.से. के अधिकारी धीरेन्द्र मोहन झा हैं। मिथिला विभूति श्री झा के निधन पर जिले के डॉ.महेंद्र नारायण राम,हीरेन्द्र झा, डॉ.संजीव शमा, कुमार साहब, डॉ.अनिल ठाकुर, काशीनाथ झा किरण, विनय विश्वबंधु, अमरकांत लाल, सतीश साजन, प्रो.प्रीतम निषाद, प्रजापति ठाकुर, दिलीप कुमार झा, डॉ हेमचन्द्र झा, अजित आज़ाद, मलयनाथ मिश्र, प्रो.सर्वनारायण झा, प्रदीप पुष्प, गौरीशंकर साह आदि साहित्यकारों ने संवेदना प्रकट करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि दी है ।

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