अक्षत सुहाग व कोरोना मुक्त भारत का वट सावित्री व्रतियों ने मांगा वरदान

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झंझारपुर मधुबनी /डॉ संजीव शमा : पति कि लम्बी आयु के लिये किया जाने वाला वट सावित्री व्रत बीते शुक्रवार को सुहागिनों के पूजन अर्चना के संग श्रद्धा के साथ संपन्न हो गया । ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन मनाए जाने वाले इस व्रत के दिन महिलाएं मंदिरों में पूजा करती हैं और वट वृक्ष में कच्चा सूत बांधकर अपने पति की लंबी आयु और स्वस्थ रहने की प्रार्थना करती हैं । इस बार ये व्रत कोरोना महामारी को लेकर लागू लॉकडाउन में सुहागिन व्रतियों ने किया । कोरोना काल में होने वाली इस पूजा-व्रत को लेकर व्रतियों में कुछ संशय भी देखने को मिला। संशय लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर था। दरअसल इसमें वट वृक्ष के पास जाना अनिवार्य होता है और वहां काफी भीड़ हो जाया करती है ।

पं.शिव कुमार मिश्र बताते हैं कि महिलाएं अखण्ड सौभाग्य के लिए वट सावित्री व्रत करती हैं । पर इस बार कोरोना काल की वजह से पहले कि तरह पूजा करने में दिक्कतें आयी । हालांकि उन्होंने कहा कि इस बात से व्रतीयों को परेशान होने की जरूरत नहीं श्रद्धा में कोई कमी नहीं रखा गया। पं. मिश्र कहते हैं कि कई शास्त्रों में कहा गया है, भाव मिच्छन्ति देवता । अतः भाव से ही भगवान प्रसन्न होते हैं अत: व्रती को भाव से पूजन करना चाहिए । इसके लिए उपाय बताते हुए पं.मिश्र ने कहा कि घर में ही वट के पेड़ की टहनी लाकर पूजा करने पर भी फल की प्राप्ति होती है । कथा खुद पढ़कर भोग लगा लें या​ पंडित से फोन पर भी कथा सुन सकती हैं । दान देने कि सामग्री कुछ घर पर ही हो तो वो निकाल पर चढ़ा दें, ना हो तो पैसे भी चढ़ा सकती है जिससे बाद में दान किया जा सकता है । इस दिन वट वृक्ष पूजन का विशेष महत्व है । अतः वट वृक्ष या उसका टहनी लाकर उसका श्रद्धापूर्वक पूजन करने में कोई बात नहीं है ।

सुहागिन व्रतियों ने सर्वप्रथम माता गौरी का पूजन कर पंखा, फल, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि लेकर पूजन की। जैसे सावित्री के सुहाग पर आंच नहीं आयी इसी कामना के साथ अपनी सुहाग की रक्षा के लिए व्रत धारण कर नव विवाहिता वर-वधू बहुत ही हर्ष उल्लास के साथ पर्व मनाया गया । सुहागिनों ने बताया कि कोरोना काल में लॉक डाउन को लेकर थोड़ी मुश्किलें जरूर आईं । बावजूद इस बार अपने घरों पर रहकर पूजन किया गया ।

वट सावित्री व्रत का महात्म्य :

हर साल ज्येष्ठ मास के अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला वट सावित्री पूजा सुहागिन अपने पति के दीर्घायु एवं अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ मनाती है । पारंपरिक श्रृंगार के साथ सुहागिन महिलाओं ने बांस की बनी डलिया में पूजन सामग्री लेकर वट सावित्री पूजन अनुष्ठान विधि – विधान के साथ करती है । जेठ की भीषण गर्मी के चिलचिलाती धूप के बीच नङ्गे पैर पूजा की डाली लिये सुहागिन मंदिर और बरगद के पेड़ों तक पहुँच पूजन की । इस बार नगर के प्रसिद्ध कन्हौली बड़गाछ ,पाठशाला दुर्गा मंदिर परिसर, बाबा पंचानाथ महादेव मंदिर, बेलारही रामपुर स्थित बड़गाछ, मंठ पोखर ,शांतिनाथ महादेव मंदिर के अलावा ग्रामीण इलाकों के रतुपार,खड़ौआ, नवानी,कनकपुरा, सिमरा, रेवाड़ी, चनौरा गोट, बलियारी, महरैल, मेंहथ, महिनाथपुर, नरुआर, नवटोल, कैथीनिया आदि गांवों में कोरोना को लेकर जारी लॉक डाउन को देखते हुए सुहागिन महिलाओं की भीड़ कम देखने को मिला । वट सावित्री पूजन हर्षोल्लास के साथ किये जाने की सूचना है । वट सावित्री पूजन के संबंध में मिथिला व्रत त्योहार की जानकार कुशल गृहिणी अनु अंजना ने बताया कि आज ही के दिन सावित्री ने बरगद पेड़ के नीचे अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज को शास्त्रगत सवालों से प्रसन्न कर वापस प्राप्त की थी । इसी मान्यता के मुताबिक अपने सुहाग की रक्षा व पति की लंबी उम्र की कामना को लेकर सुहागिन वट सावित्री का पूजन और व्रत करती है । उन्होंने बताया कि वट सावित्री पर्व परंपरा, परिवार और प्रकृति प्रेम का पाठ पढ़ाता है । पुराणों में इसे सौभाग्य को देनेवाला और संतान की प्राप्ति में सहायता प्रदान करने वाला माना गया है । इस व्रत का उद्देश्य सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना है । इस व्रत में वटवृक्ष का बहुत खास महत्व होता है । पुराणों के अनुसार बरगद के पेड़ में त्रिदेव का निवास है । ब्रह्मा वट के जड़ भाग में, विष्णु तना में और महेश का वास ऊपरी भाग में है । वटवृक्ष पूजन हेतु सुहागिन महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर निर्जला व्रत के साथ पूजन सामग्री में सिंदूर, रोली, फूल, धूप, दीप, अक्षत, कुमकुम, रक्षा सूत्र, मिठाई, चना, फल, दूध, बांस के पंखे, नये वस्त्र के साथ एकत्रित होकर विधि – विधान से वटवृक्ष की पूजा अर्चना की और सावित्री – सत्यवान तथा यमराज के कथा का श्रवण करती है । ततपश्चात हल्दी में रंगे रक्षा सूत्र के रूप में कच्चे धागे लेकर बरगद वृक्ष का सात बार परिक्रमा कर और पेड़ में धागे को लपेटते हुये हर परिक्रमा में वृक्ष के जड़ में एक चना चढ़ाते हुए और अपने पति एवं संतान की दीर्घायु होने की प्रार्थना करती है । इस दौरान वट वृक्ष की जड़ में दूध और जल भी चढ़ाया जाता है । पूजन व कथा श्रवण के बाद सुहागिन एक – दूसरे को सुहाग व श्रृंगार के सामान भेंट करती है । बरगद के कोमल अंकुर को चना के साथ निगलकर व्रत तोड़ने का विधान है ।

पं.शिव कुमार मिश्र कहते हैं ” वटमूले तोपवासा” अर्थात वट वृक्ष के मूल में बैठकर पूजन तथा व्रत कथा आदि पढ़ने व सुनने से वांछित फल की प्राप्ति होती है । इस संबंध में उन्होंने बताया कि वट सावित्री पूजा को आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना जाता है । इसे ज्ञान और निर्वाण का प्रतीक भी माना गया है ।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वटसावित्री पूजन के संबंध में वर्णित कथानुसार — सावित्री भद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री थी । जो उन्हें सावित्री देवी के कृपा से प्राप्त हुई थी । राजा को अपनी गुणवती पुत्री के लिए सुयोग्य वर नहीं मिलने पर उन्होंने अपनी पुत्री सावित्री को स्वयं सुयोग्य वर ढूंढने को कहा । सावित्री ने शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र राजकुमार सत्यवान को अपने वर के रूप में चुन लिया । मुनि नारद ने सावित्री और उनके पिता को बताया कि सत्यवान को एक साल का ही वैवाहिक सुख लिखा है इसके उपरांत मृत्यु निश्चित है । पति के दीर्घायु जीवन की फ़िक्र मंद सावित्री ने मृत्यु की निर्धारित तिथि से तीन दिन पूर्व निर्जला व्रत रखकर वटवृक्ष की पूजा करने लगी । चौथे दिन जंगल गये सत्यवान का प्राण यमराज हर चल देते हैं । यमराज के पीछे – पीछे सावित्री अपने पति की प्राण बचाने चल देती है । यमराज सावित्री को विधि का विधान बताकर ऐसा करने से रोकते हैं । परंतु अपने शास्त्रगत सवालों से सावित्री यमराज को प्रसन्न कर जाती है और वरदान की पात्र हो जाती है । यमराज सावित्री से वरदान मांगने को कहते हैं । सावित्री अपने पहले वरदान में पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगती है । यमराज ने ऐसा ही होगा का वचन दिया । सावित्री को वचन देने के उपरांत यमराज को अपनी भूल का अहसास हुआ कि वे गलती से सत्यवान की प्राण को वापस देने का वरदान दे चुके हैं । वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान प्राण लौटते ही उठ बैठता है और सावित्री अपने पति के प्राण वापस प्राप्त करने में कामयाब हो जाती है । इस दौरान वट वृक्ष ने मृत सत्यवान की देखरेख की थी । जिसके लिए सावित्री ने वटवृक्ष का आभार व्यक्त करते हुए उसकी परिक्रमा की । इसलिए सुहागिन महिलाएं ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन व्रत रखकर वटवृक्ष की पूजा अर्चना कर परिक्रमा करती है । कथा श्रवण के बाद सुहागिनों ने वट के पत्ते को सिर के पीछे लगाकर वापस घर पहुंच कर पति को पंखा झल जल पिलाकर व्रत तोड़ी । इस तरह वटसावित्री पूजन पर्व हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ ।