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एक्साइज केस में बढ़ा टकराव: केजरीवाल-सिसोदिया के बाद दुर्गेश पाठक ने भी अदालत से दूरी बनाई

दिल्ली की बहुचर्चित आबकारी (एक्साइज) नीति मामले में राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। आम आदमी पार्टी (आप) के शीर्ष नेताओं के बाद अब पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक ने भी अदालत की कार्यवाही से खुद को अलग करने का फैसला लिया है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर साफ कर दिया कि वे इस मामले में आगे न तो व्यक्तिगत रूप से पेश होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील अदालत में दलील देगा।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब इससे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया भी इसी तरह का रुख अपना चुके हैं। लगातार तीन प्रमुख नेताओं द्वारा अदालत में पेशी से इनकार किए जाने से इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है और इसे लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।

दुर्गेश पाठक ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा कि वे अरविंद केजरीवाल के साथ खड़े हैं और उनके फैसले का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया है। उन्होंने यह भी बताया कि वे अपनी ओर से किसी वकील को भी अदालत में पेश नहीं करेंगे।

इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को चार पन्नों का पत्र लिखकर यह जानकारी दी थी कि वे इस मामले में आगे अदालत में पेश नहीं होंगे। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि यह निर्णय उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया है और इसके परिणामों को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि यह भी दिखाई देना चाहिए कि न्याय हो रहा है।

केजरीवाल ने अपने इस फैसले को नैतिक आधार देते हुए महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह कदम किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि न्याय के सिद्धांतों की रक्षा के लिए उठाया गया है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

मंगलवार को मनीष सिसोदिया ने भी इसी तरह का पत्र लिखकर अदालत में पेशी से इनकार कर दिया था। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि उन्हें अब इस अदालत से न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। उन्होंने भी अपने फैसले को महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित बताते हुए इसे एक शांतिपूर्ण विरोध का रूप दिया।

दरअसल, यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब आरोपियों ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से अनुरोध किया था कि वे इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लें। आरोपियों का कहना था कि न्यायमूर्ति के परिवार के कुछ सदस्य केंद्र सरकार के पैनल में वकील के रूप में कार्यरत हैं और उन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से केस मिलते हैं। इस आधार पर उन्होंने निष्पक्ष सुनवाई को लेकर सवाल उठाए थे।

हालांकि, अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे आरोपों के आधार पर किसी जज को मामले से अलग नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि को न्यायपालिका पर अविश्वास फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस फैसले के बाद आप नेताओं ने एक के बाद एक अदालत में पेश न होने का फैसला लिया।

यह मामला दिल्ली की नई आबकारी नीति से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की है, जिसमें केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। फिलहाल इस अपील पर सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में चल रही है।

13 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल खुद अदालत में पेश हुए थे और उन्होंने जज से इस मामले से अलग होने की मांग की थी। लेकिन 20 अप्रैल को अदालत ने उनकी इस मांग को खारिज कर दिया। इसके बाद से ही घटनाक्रम ने तेजी पकड़ ली और अब एक-एक कर आप नेताओं ने अदालत से दूरी बना ली है।

इस पूरे मामले ने राजनीतिक माहौल को भी गर्मा दिया है। जहां आम आदमी पार्टी इसे न्याय के लिए संघर्ष बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे न्यायपालिका के प्रति अनादर करार दे रहे हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस तरह के कदम से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और इससे जुड़े कानूनी परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अदालत इस स्थिति में क्या रुख अपनाती है और आगे की कार्रवाई किस दिशा में जाती है। साथ ही यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है और वहां से क्या फैसला आता है।

फिलहाल, एक्साइज पॉलिसी से जुड़ा यह विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह न्यायपालिका पर विश्वास, राजनीतिक रणनीति और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा बन चुका है। आने वाले समय में इस केस से जुड़े और भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ सकते हैं, जो इसकी दिशा और परिणाम तय करेंगे।

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