फरीदाबाद: हरियाणा के फरीदाबाद से सामने आया एक मामला इन दिनों न्याय व्यवस्था और पशु संरक्षण कानूनों को लेकर व्यापक बहस का कारण बन गया है। एक पालतू कुत्ते को भीषण गर्मी में धूप के नीचे बांधकर रखने के मामले में अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए महज 50 रुपये का जुर्माना लगाया। यह फैसला भले ही मौजूदा कानून के तहत दिया गया हो, लेकिन इसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसे कानून आज के समय में प्रभावी हैं।

घटना फरीदाबाद के सेक्टर-82 स्थित पुरी प्रणायम सोसायटी की है, जहां 20 जून 2024 को यह मामला सामने आया था। सोसायटी की निवासी वृंदा शर्मा ने पुलिस को शिकायत दी थी कि उनके पड़ोसी दीपक शर्मा ने अपने पालतू कुत्ते को तेज धूप में बांध रखा है। शिकायत के अनुसार, कुत्ते को न तो छाया मिल रही थी और न ही पानी की पर्याप्त व्यवस्था थी, जिससे उसकी हालत गंभीर हो रही थी।
शिकायत मिलने के बाद बीपीटीपी थाना पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और मौके पर पहुंचकर कुत्ते को वहां से सुरक्षित निकाला। पुलिस के अनुसार, जब टीम मौके पर पहुंची तो आरोपी ने सहयोग करने के बजाय विरोध किया और पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार भी किया। हालांकि, पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में लेते हुए कुत्ते को रेस्क्यू किया और आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया।
जांच के बाद यह मामला अदालत में पहुंचा, जहां अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जितेंद्र सिंह की अदालत में सुनवाई हुई। अदालत ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया। हालांकि, सजा के रूप में अदालत केवल 50 रुपये का जुर्माना ही लगा सकी, क्योंकि पशु क्रूरता अधिनियम 1960 के तहत इस अपराध के लिए अधिकतम दंड यही निर्धारित है।
यहीं से इस पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया। आम जनता, पशु प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस सजा को बेहद हल्का और अपर्याप्त बताया। उनका कहना है कि इतनी छोटी राशि का जुर्माना किसी भी व्यक्ति को इस तरह के अपराध से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। कई लोगों ने इसे “न्याय का मजाक” तक करार दिया।
दरअसल, पशु क्रूरता अधिनियम 1960 उस दौर में बनाया गया था, जब 50 रुपये की कीमत काफी अधिक होती थी। लेकिन समय के साथ महंगाई बढ़ने के बावजूद इस कानून में जुर्माने की राशि में कोई बदलाव नहीं किया गया। यही कारण है कि आज के समय में यह कानून प्रभावी नहीं रह गया है और अपराधियों के लिए किसी प्रकार का डर पैदा नहीं कर पाता।
पशु अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए। उनका मानना है कि जब तक जुर्माने की राशि को बढ़ाया नहीं जाएगा और जेल की सजा जैसी कठोर व्यवस्थाएं लागू नहीं होंगी, तब तक पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता पर रोक लगाना मुश्किल है।
इस मामले ने यह भी दिखाया है कि कानून और समाज के बीच एक बड़ा अंतर है। जहां एक ओर समाज में पशुओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है, वहीं कानून अभी भी पुराने ढांचे में बंधे हुए हैं। ऐसे में न्याय व्यवस्था भी कई बार चाहकर भी सख्त कदम नहीं उठा पाती।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय के अनुसार कानूनों में बदलाव करना बेहद जरूरी है। अगर कानून पुराने और अप्रासंगिक बने रहेंगे, तो वे अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएंगे। फरीदाबाद का यह मामला इसी बात का उदाहरण है कि किस तरह एक गंभीर अपराध के बावजूद आरोपी को केवल प्रतीकात्मक सजा ही मिल पाई।
इस घटना के बाद एक बार फिर सरकार से पशु क्रूरता अधिनियम में संशोधन की मांग उठने लगी है। सामाजिक संगठनों और पशु प्रेमियों ने अपील की है कि इस कानून को सख्त बनाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई हो सके और पशुओं को न्याय मिल सके।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि यह मामला केवल एक कुत्ते के साथ हुई क्रूरता का नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। अदालत ने कानून के अनुसार फैसला दिया, लेकिन यह फैसला समाज के उस वर्ग को संतुष्ट नहीं कर पाया जो पशुओं के अधिकारों को गंभीरता से लेता है।
फरीदाबाद की यह घटना एक चेतावनी है कि अब समय आ गया है जब कानूनों को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार बदला जाए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक बेजुबान जानवरों को न्याय दिलाना एक चुनौती बना रहेगा।
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